Saturday, March 7, 2026
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Subedaar Review: अनिल कपूर का विंटेज एंग्री हीरो अवतार, ढीली कहानी पर भारी… एक्शन है भौकाली – subedaar assessment anil kapoor radhika madan shine motion social drama tmovk

80s वाले एक्शन हीरोज का सॉफ्टवेयर बड़े पर्दे पर भौकाल जमाने के लिए कुछ अलग ही तरीके से डिजाइन था. संजय दत्त, सनी देओल जैसे सीनियर स्टार्स को दोबारा डिस्कवर किए जाने में सारा रोल इसी भौकाल का है. और ‘सूबेदार’ में अनिल कपूर को देखकर आप फिर से इसी भौकाल को डिस्कवर करेंगे. सिनेमा की जुबान में ‘स्क्रीन खा जाना’ किसे कहते हैं, ‘सूबेदार’ में अनिल कपूर इसी का बेहतरीन उदाहरण हैं.

कितना दमदार है ये ‘सूबेदार’?
अमेजन प्राइम की फिल्म में अनिल एक रिटायर्ड फौजी हैं— सूबेदार अनिल मौर्या. आम सिविलियन लाइफ से एडजस्ट करने में फेल होते फौजियों का सोशल लड़ाइयों में उतर जाना सिनेमा में एक पूरा अलग जॉनर है. ‘सूबेदार’ मोस्टली इसी जॉनर की टिपिकल कहानी है.

एक तो सूबेदार साहब इस गिल्ट में हैं कि फौज की नौकरी के चक्कर में पत्नी के आखिरी वक्त में उसके साथ नहीं थे. बिटिया के साथ बैठकर कभी कम्युनिकेशन नाम की चिड़िया देखी ही नहीं. ऊपर से बैंक में बार-बार चक्कर कटवाते क्लर्क, बेटी को तंग करते मनचले और गुंडई करते माफिया बदमाशों को देखकर हर सेकंड खयालों में फटते जा रहे इस सोल्जर को भी एक लड़ाई की तलाश है. और किसी बड़े दार्शनिक ने कहा है कि ‘आप जिसकी तलाश में हैं, वो आपकी तलाश में है!’

सूबेदार साहब की तलाश पूरी होती है रेत माफिया बबली दीदी (मोना सिंह) के भाई प्रिंस (आदित्य रावल) पर. प्रिंस वो फिल्मी गुंडा है, जिसको कैजुअली लोगों की हत्या करते देखकर रियल गुंडे भी हंसते हुए बोल दें— इत्ता थोड़े ही होता है भाई!

रिटायर्ड सूबेदार साहब को प्रिंस की बॉडीगार्ड करने की नौकरी मिलती है, लेकिन वो आततायी प्रिंस की ही बॉडी बीच चौराहे पर तोड़ आते हैं. सूबेदार साहब दिल्ली से तो नहीं हैं, लेकिन गाड़ी पर स्क्रैच वगैरह उन्हें कतई पसंद नहीं. गाड़ी को कुछ होते ही वो हत्थे से उखड़ जाते हैं. उधर उनकी बिटिया श्यामा (राधिका मदान) के जीवन में दिन दूभर करने वाले कॉलेज के छिछोरे लड़कों का पचड़ा है. सूबेदार साहब और उनकी बेटी की जवाबी कार्रवाई ही फिल्म की कहानी है.

क्या साफ क्या मटमैला?
फटने को तैयार ज्वालामुखी बने घूम रहे रिटायर्ड फौजी के रोल में गुर्राते हुए अनिल कपूर को एक्शन अवतार में देखना बहुत मजेदार है. वो एक बार फिर प्रूव करते हैं कि वो बॉलीवुड के सबसे दमदार एक्टर्स में क्यों गिने जाते रहे हैं. फिजिकल एक्शन तो अलग मैटर है, मगर एक्शन हीरो के एक्सप्रेशंस को अनिल ने ऐसे जान दी है कि उनके फाइट सीन्स देखकर आदमी स्क्रीन की तरफ खिंचता चला जाता है.

बबली दीदी के रोल में मोना सिंह ने खौफ का माहौल तो खूब बनाया है. मगर किरदार की कमजोर राइटिंग, उन्हें एक ही फिजिकल स्पेस में लिमिटेड रखती है और उनकी मेहनत को फीका करती है. उन्हें किसी तरह कहानी के मेन एक्शन में और ज्यादा शामिल किया जाना चाहिए था. आदित्य रावल की स्क्रीन प्रेजेंस बहुत तगड़ी है और उनकी एक्टिंग में तेज धार है. मगर उनके किरदार को भी राइटिंग ने अकेला छोड़ दिया है.

‘पंचायत’ फेम फैजल मलिक इन विस्फोटक भाई-बहन के बीच बैलेंस बनाने वाले गैंगस्टर-मैनेजर के रोल में बहुत सॉलिड हैं. हमेशा अपने काम से दिल जीत लेने वाले सीनियर एक्टर सौरभ शुक्ला ने भी माहौल जमाया है. ‘सूबेदार’ में उन्हें शानदार एक्शन करते देखकर आपको मजा आ जाएगा. राधिका का किरदार श्यामा थोड़ा बेहतर लिखा गया है. ‘सूबेदार’ उसे एक जुझारू लड़की के रोल में बार-बार उन हालातों में फंसाती है जहां उसे मदद के लिए किसी न किसी पुरुष की जरूरत पड़े. लेकिन श्यामा को कहानी पूरी तरह अपने दम पर ही इन हालातों से लड़कर निकलते भी दिखाती है. ‘सूबेदार’ में हीरो की बेटी, उसकी फाइट में उलझन बढ़ाने वाली समस्या नहीं है बल्कि खुद एक फाइटर है जिसके होने से फाइट आसान होती है.

इसके अलावा ‘सूबेदार’ बहुत कुछ क्रांतिकारी नहीं करती. बल्कि कहानी को एक टेम्पलेट में ही रखती है. वो तो अनिल की एक्टिंग, स्वैग, एक्शन और स्टाइल की पावर है जो उनके किरदार को मास बनाती है. ‘सूबेदार’ की पेस, नैरेटिव की पकड़ बीच-बीच में दाएं-बाएं होती रहती है, राइटिंग की दिक्कतें भी हैं. लेकिन सिर्फ रेड जिप्सी पर सवार अनिल कपूर का एंग्री ओल्डमैन अवतार ‘सूबेदार’ देख डालने की पर्याप्त वजह है.

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Suhas
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Suhas Bhokare is a journalist covering News for https://onlinemaharashtra.com/
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