Ravi Pradosh Vrat Remedies: 1 मार्च को पड़ने वाले प्रदोष व्रत पर कुछ आसान से उपाय करके आपको लाभ मिल सकते हैं। जानें सूर्य से जुड़ा सबसे आसान उपाय जो आप इस दिन कर सकते हैं। साथ ही एक पाठ के बारे में जानें जिससे शादी की बाधाएं खत्म हो जाती हैं।
Ravi Pradosh Vrat 2026: हिंदू पंचांग में कोई भी ऐसा महीना नहीं होता है, जिसमें कोई तीज-त्योहार ना हो और यही इसकी खूबसूरती भी है। सनातन धर्म में प्रदोष व्रत का खूब महत्व है। इस दिन भगवान शिव की आराधना करते हैं। महीने में ये व्रत दो बार आता है और खास बात ये है कि इसका नाम दिन के हिसाब से पड़ता है। फाल्गुन मास का आखिरी प्रदोष व्रत कल यानी 1 मार्च को है। हिंदू धर्म में मान्यता है कि प्रदोष व्रत की पूजा और उपाय अगर विधि-विधान से कर ली जाए तो भगवान शिव की कृपा खूब बरतती हैं। फाल्गुन के महीने का आखिरी प्रदोष व्रत रविवार को पड़ रहा है तो इसे रवि प्रदोष व्रत कहा जाएगा। इस दिन सूर्य से जुड़ा एक खास उपाय कर सकते हैं। साथ ही इस दिन पूजा के समय अगर पार्वती चालीसा पढ़ी जाए तो शादी में आने वाली सारी बाधाएं खत्म हो जाती हैं।
कब होता है प्रदोष व्रत?
हिंदू पंचांग के हिसाब से हर महीने पड़ने वाले कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर ही प्रदोष व्रत पड़ता है। इस खास व्रत के दौरान शिव जी को तो पूजा ही जाता है, लेकिन साथ में मां पार्वती की भी पूजा की जाए तो कई लाभ मिलते हैं। ऐसे में पूजा को विधि पूर्वक करना जरूरी है। सबसे पहले तो जानें कि फाल्गुन महीने के आखिरी प्रदोष व्रत की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त क्या हैं?
रवि प्रदोष व्रत पूजा मुहूर्त
पंचांग के हिसाब से त्रयोदशी तिथि की शुरुआत आज यानी 28 तारीख से ही हो जाएगी। इसकी शुरुआत रात में 8 बजकर 43 मिनट से होगी और ये 1 मार्च को रात में 9 बजकर 11 बजे तक रहने वाली है। इसी वजह से प्रदोष व्रत 1 तारीख को होगा। पूजा के शुभ मुहूर्त की बात की जाए तो शाम को 6 बजकर 21 मिनट से लेकर 7 बजकर 8 मिनट के बीच पूजा करना फलदायी साबित होगा।
रवि प्रदोष व्रत पर करें सूर्य से जुड़ा ये उपाय
रविवार का संबंध सूर्यदेव से होता है। ऐसे में रवि प्रदोष की पूजा के वक्त सूर्यदेव की भी आराधना करनी चाहिए। उपाय के तौर पर इस दिन सूर्य को अर्घ्य जरूर दें। ऐसा करने से करियर और बिजनेस में आने वाली सारी बाधाएं खत्म हो जाती है और आने वाले समय में जातक को इस क्षेत्र में अच्छी ग्रोथ देखने को मिलती है।
करें पार्वती चालीसा का ये पाठ
प्रदोष व्रत के दौरान उपाय के तौर पर मां पार्वती की चालीसा का पाठ करना चाहिए। ऐसा करने से महादेव की तो कृपा मिलती ही है, साथ में मां पार्वती भी अपने आशीर्वाद से शादीशुदा जिंदगी में आने वाली बाधा को खत्म कर देती हैं। नीचे पढ़ें पार्वती चालीसा-
॥पार्वती चालीसा॥
जय गिरी तनये दक्षजे,शम्भु प्रिये गुणखानि।
गणपति जननी पार्वती,अम्बे! शक्ति! भवानि॥
ब्रह्मा भेद न तुम्हरो पावे। पंच बदन नित तुमको ध्यावे॥
षड्मुख कहि न सकत यश तेरो। सहसबदन श्रम करत घनेरो॥
तेऊ पार न पावत माता। स्थित रक्षा लय हित सजाता॥
अधर प्रवाल सदृश अरुणारे। अति कमनीय नयन कजरारे॥
ललित ललाट विलेपित केशर। कुंकुम अक्षत शोभा मनहर॥
कनक बसन कंचुकी सजाए। कटी मेखला दिव्य लहराए॥
कण्ठ मदार हार की शोभा। जाहि देखि सहजहि मन लोभा॥
बालारुण अनन्त छबि धारी। आभूषण की शोभा प्यारी॥
नाना रत्न जटित सिंहासन। तापर राजति हरि चतुरानन॥
इन्द्रादिक परिवार पूजित। जग मृग नाग यक्ष रव कूजित॥
गिर कैलास निवासिनी जय जय। कोटिक प्रभा विकासिन जय जय॥
त्रिभुवन सकल कुटुम्ब तिहारी। अणु अणु महं तुम्हारी उजियारी॥
हैं महेश प्राणेश! तुम्हारे। त्रिभुवन के जो नित रखवारे॥
उनसो पति तुम प्राप्त कीन्ह जब। सुकृत पुरातन उदित भए तब॥
बूढ़ा बैल सवारी जिनकी। महिमा का गावे कोउ तिनकी॥
सदा श्मशान बिहारी शंकर। आभूषण हैं भुजंग भयंकर॥
कण्ठ हलाहल को छबि छायी। नीलकण्ठ की पदवी पायी॥
देव मगन के हित अस कीन्हों। विष लै आपु तिनहि अमि दीन्हों॥
ताकी तुम पत्नी छवि धारिणि। दूरित विदारिणी मंगल कारिणि॥
देखि परम सौन्दर्य तिहारो। त्रिभुवन चकित बनावन हारो॥
भय भीता सो माता गंगा। लज्जा मय है सलिल तरंगा॥
सौत समान शम्भु पहआयी। विष्णु पदाब्ज छोड़ि सो धायी॥
तेहिकों कमल बदन मुरझायो। लखि सत्वर शिव शीश चढ़ायो॥
नित्यानन्द करी बरदायिनी। अभय भक्त कर नित अनपायिनी॥
अखिल पाप त्रयताप निकन्दिनि। माहेश्वरी हिमालय नन्दिनि॥
काशी पुरी सदा मन भायी। सिद्ध पीठ तेहि आपु बनायी॥
भगवती प्रतिदिन भिक्षा दात्री। कृपा प्रमोद सनेह विधात्री॥
रिपुक्षय कारिणि जय जय अम्बे। वाचा सिद्ध करि अवलम्बे॥
गौरी उमा शंकरी काली। अन्नपूर्णा जग प्रतिपाली॥
सब जन की ईश्वरी भगवती। पतिप्राणा परमेश्वरी सती॥
तुमने कठिन तपस्या कीनी। नारद सों जब शिक्षा लीनी॥
अन्न न नीर न वायु अहारा। अस्थि मात्रतन भयउ तुम्हारा॥
पत्र घास को खाद्य न भायउ। उमा नाम तब तुमने पायउ॥
तप बिलोकि रिषि सात पधारे। लगे डिगावन डिगी न हारे॥
तब तव जय जय जय उच्चारेउ। सप्तरिषि निज गेह सिधारेउ॥
सुर विधि विष्णु पास तब आए। वर देने के वचन सुनाए॥
मांगे उमा वर पति तुम तिनसों। चाहत जग त्रिभुवन निधि जिनसों॥
एवमस्तु कहि ते दोऊ गए। सुफल मनोरथ तुमने लए॥
करि विवाह शिव सों हे भामा। पुनः कहाई हर की बामा॥
जो पढ़ि है जन यह चालीसा। धन जन सुख देइहै तेहि ईसा॥
कूट चन्द्रिका सुभग शिर,जयति जयति सुख खानि।
पार्वती निज भक्त हित,रहहु सदा वरदानि॥
डिस्क्लेमर- (इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।)