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Lakhauri Mirch Almora: पहाड़ के खान-पान की बात हो और अल्मोड़ा की लखौरी मिर्च का जिक्र न आए, ऐसा मुमकिन नहीं है. अपने सुनहरे पीले रंग और जुबान पर चढ़ जाने वाले तीखेपन के कारण यह मिर्च आज उत्तराखंड की सरहदों को पार कर दुनिया भर में अपनी पहचान बना रही है. आखिर क्यों इस मिर्च को ‘पहाड़ी सोना’ कहा जाता है और कैसे यह एक छोटा सा मसाला पलायन और जंगली जानवरों की मार झेल रहे किसानों के लिए उम्मीद की नई किरण बन सकता है.

उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में कई पारंपरिक कृषि उत्पाद प्रसिद्ध हैं, जिनमें अल्मोड़े की लखौरी मिर्च का विशेष स्थान है. यह मिर्च अपने अलग स्वाद, रंग और तीखेपन के कारण पहाड़ की पहचान बन चुकी है. स्थानीय लोग इसे लखौरी या पीली मिर्च भी कहते हैं. इसका नाम अल्मोड़ा क्षेत्र और लखोरा नामक स्थान से जुड़ा माना जाता है, जहां इस किस्म की मिर्च की खेती सबसे पहले की गई थी.

लखौरी मिर्च की सबसे बड़ी विशेषता इसका अलग रंग और तीखापन है. जब यह मिर्च सूखती है तो इसका रंग हल्का पीला या सुनहरा दिखाई देता है और इसकी सतह पर हल्की झुर्रियां भी पड़ जाती हैं. इसका स्वाद बहुत तीखा होता है, इसलिए इसे कम मात्रा में ही उपयोग किया जाता है. यही कारण है कि यह मिर्च पहाड़ी व्यंजनों में स्वाद बढ़ाने के लिए खास मानी जाती है.

अल्मोड़ा और आसपास के पहाड़ी क्षेत्रों में इस मिर्च की खेती लंबे समय से की जाती रही है. यहां की जलवायु और मिट्टी इस फसल के लिए उपयुक्त मानी जाती है. पहले कई गांवों में किसान बड़े पैमाने पर लखौरी मिर्च उगाते थे और इसे स्थानीय बाजारों में बेचते थे. यह खेती किसानों के लिए अच्छी आय का स्रोत भी थी और पहाड़ी कृषि की पहचान मानी जाती थी.
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लखौरी मिर्च का उपयोग कई प्रकार से किया जाता है. इसे सुखाकर पाउडर बनाया जाता है, जिससे सब्जियों और दालों का स्वाद बढ़ाया जाता है. इसके अलावा कई जगहों पर इससे मिर्च फ्लेक्स और खास प्रकार का नमक भी बनाया जाता है, जिसे पहाड़ी नमक या मसाले के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. नमकीन और स्नैक्स बनाने वाले व्यापारी भी इस मिर्च को पसंद करते हैं क्योंकि इसका रंग और स्वाद दोनों अच्छे होते हैं.

लखौरी मिर्च केवल एक मसाला नहीं है, बल्कि यह पहाड़ की परंपरा और संस्कृति का हिस्सा भी है. पहाड़ी घरों में इसे धूप में सुखाकर साल भर के लिए सुरक्षित रखा जाता है. कई पारंपरिक व्यंजनों में इसका उपयोग अनिवार्य माना जाता है. पुराने समय में लोग इसे घर की छत या आंगन में सुखाते थे और जरूरत के अनुसार इस्तेमाल करते थे.

समय के साथ इस मिर्च की खेती में कमी भी देखने को मिली है. जंगली जानवरों के हमले, पलायन और खेती में कम लाभ मिलने के कारण कई किसानों ने इस फसल से दूरी बना ली है. रिपोर्ट के अनुसार पिछले वर्षों में हजारों किसान मिर्च की खेती छोड़ चुके हैं, जिससे इस पारंपरिक फसल का उत्पादन भी प्रभावित हुआ है.

लखौरी मिर्च पहाड़ की एक अनमोल पहचान है. यदि इसके उत्पादन और विपणन को सही प्रोत्साहन मिले तो यह किसानों के लिए फिर से आय का अच्छा स्रोत बन सकती है. साथ ही इस पारंपरिक फसल को बचाने से स्थानीय संस्कृति और पहाड़ी स्वाद भी सुरक्षित रहेगा. इसलिए जरूरत है कि सरकार और समाज मिलकर इस खास मिर्च की खेती को बढ़ावा दें.