
जघन्य से लेकर स्ट्रीट क्राइम तक के जुर्म को अंजाम दे रहे है राजधानी के नाबालिग । चाकूबाजी और पिस्टल तक उनके हाथों में पहुंच चुका है। गैंगस्टर्स भी ऑर्गनाइज्ड क्राइम में कच्ची उम्र के लड़को का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसी पर फोकस है एनबीटी की यह सीरीज।

अपराध करना बन गया है इनके लिए ‘खेल’
एक वक्त था, जब निम्न आय वर्ग की बस्तियों वाली गलियों में लड़कों की गिल्ली-डंडा, लट्टू, कंचे और क्रिकेट खेलने का शोर गूंजता था। अब उन्हीं गलियों में मर्डर, रेप, कातिलाना हमला, डकैती और लूट की ताबड़तोड़ वारदात से पुलिस का सायरन बजता है। आखिर छोटी उम्र की यह पीढ़ी क्यों राह भटक रही है ? जमीनी पड़ताल करने पर जो सच उजागर हुआ, वो बताता है कि नाबालिगों के जुर्म की जड़ें परिवार, परिवेश और सामाजिक उपेक्षा में गहराई तक धंसी हुई हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि जुवेनाइल से जुड़े करीब 75% मामलों झुग्गी-झोपड़ी और पुनर्वास बस्तियों से हैं। लगभग 22% लोअर मिडल क्लास तो महज 3% मिडल क्लास परिवारों से आते हैं। यह सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि उस सामाजिक ढांचे की कहानी हैं, जहां बचपन-लड़कपन धीरे-धीरे खोता जा रहा है।
लगातार कर रहे हैं वारदात
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अगर जल्द ही इस समस्या का समाधान नहीं हुआ तो आने वाले समय में हालात बदतर हो सकते हैं। एक नजर कुछ बड़े मामलों पर।
12 फरवरी 2026 चाकू से गोदकर हत्या, 4 पकड़े
- नरेला इंडस्ट्रियल एरिया के बवाना जेजे कॉलोनी में 17 साल के नावालिग को चाकू गोद कर मार दिया। सात आरोपियों को पकड़ा गया, जिनमें चार जुवेनाइल थे।
11 फरवरी 2026: टोपी लेने के विरोध पर मर्डर
- रोहिणी के विजय विहार इलाके में टोपी लेने का विरोध करने पर नाबालिग को दो दोस्तों ने ही चाकू मार दिया। दो दिन बाद मौत हुई तो हत्या का खुलासा हुआ।
9 फरवरी 2026: स्कूल के सामने ही ले ली जान
- बाहरी दिल्ली के मंगोलपुरी एरिया में 25 दिन पहले हुए झगड़े में 15 साल के छात्र की हत्या को सरकारी स्कूल के सामने चार नाबालिगों ने अंजाम दिया।
तेजी से बढ़ रहा गंभीर जुर्म करने का भी ग्राफ
दिल्ली पुलिस के आंकड़े बताते हैं कि हत्या में 2024 की तुलना में 2025 में 17 नाबालिग ज्यादा शामिल रहे तो जानलेवा हमले में 123 अधिक जुवेनाइल शामिल रहे। डकैती में आठ नाबालिग ज्यादा पकड़े गए तो लूट में 109 अधिक लड़के शामिल थे। रेप की बात करें तो 2024 की तुलना में 2025 में SO नाबालिग ज्यादा लिप्त पाए गए। दिल्ली में 2024 में जहां सभी तरह के जुर्म में शामिल नाबालिगों की तादाद 3270 रही तो 2025 में इसका ग्राफ 3833 तक पहुंच गया। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, राजधानी में 2023 में आरोपियों के तौर पर 3098 नाबालिग पकड़े गए थे। इससे ज्यादा महाराष्ट्र (3970) और मध्य प्रदेश (3619) था।
अनजाने में अनदेखी करना भी है वजह
एक्सपर्ट्स बताते हैं कि झुग्गी-झोपड़ी और पुनर्वास बस्तियों में रहने वाले अधिकतर माता-पिता दिहाड़ी मजदूर होते हैं। सुबह से शाम तक जॉब की जद्दोजहद में बच्चों के जीवन से अनजाने में दूर हो जाते हैं। बच्चे स्कूल से लौटते हैं तो मार्गदर्शन देने वाला कोई नहीं होता। शाम तक थके-हारे लौटे माता-पिता के पास अक्सर यह पूछने का समय नहीं होता कि दिनभर क्या हुआ। धीरे-धीरे बच्चों की दिनचर्या पर से परिवार की नजर हट जाती है। छोटे घर, सीमित जगह और निजी स्पेस का अभाव भी समस्या को गहरा करता है । जिज्ञासा से शुरू हुई नकल धीरे-धीरे आदत बन जाती है, जल्द लत में बदल जाती है।
कंडक्ट डिसऑर्डर से होती है शुरुआत
राम मनोहर लोहिया अस्पताल के प्रोफेसर सायकेट्री डॉ. लोकेश शेखावत बताते हैं कि बच्चों में दिखने वाला हिंसक या नियम तोड़ने वाला व्यवहार हमेशा ‘सिर्फ शरारत’ नही होता। कई मामलों में यह एक गहरी मानसिक स्थिति का संकेत हो सकता है, जिसे मनोविज्ञान की भाषा में ‘कंडक्ट डिसऑर्डर’ कहा जाता है। वे अक्सर नकारात्मक या आपराधिक छवि वाले लोगों को ही अपना रोल मॉडल मान लेते हैं। हिंसात्मक खेलों और जोखिम भरे व्यवहार की ओर आकर्षण बढ़ जाता है। ये समझ नहीं पाते कि उनके व्यवहार से दूसरों को कैसी पीड़ा होती है। ऐसे बच्चे टीनएज तक नशा, ग्रुप या गैग बनाना, ‘बड़ों जैसा’ आक्रामक व्यवहार और छोटी-छोटी बातों पर हिंसक होने लगते है। कई मामलों में शुरुआत छोटी चोरी या लूट से होती है, जो गलत संगति और आपराधिक तत्वों के प्रभाव में आकर बड़े अपराधों तक पहुंच जाती है।
करवट लेती उम्र मांगे अच्छी गाइडेंस
एक्सपर्ट के अनुसार, 12-17 वर्ष की उम्र अधिक संवेदनशील होती है। इस दौर में बच्चे तेजी से सीखते हैं चाहे सही हो या गलत। जब परिवार सही-गलत का फर्क समझाने में विफल रहता है तो सड़क, पड़ोस, सोशल मीडिया और गलत संगति उनके टीचर बन जाते हैं। एक पुलिस अधिकारी कहते हैं, अगर माता-पिता रोज कुछ मिनट बच्चों से बातचीत करें तो कई अपराध जन्म लेने से पहले ही रोके जा सकते हैं। लोअर मिडल क्लास परिवारों में समस्या का स्वरूप अलग है। छोटे घरों में साफ सीमाओं का अभाव, संवाद की कमी और सेक्स एजुकेशन की गैरमौजूदगी कई बार गलत जिज्ञासा और दबाव की ओर धकेल देती है।
