मांग और सरकारी ड्यूटी से स्टील शेयरों में उछाल
स्टील कंपनियों के शेयर आज बाजार के ब्रॉडर इंडेक्स BSE Sensex को पीछे छोड़ते हुए चढ़े। इसकी मुख्य वजह है देश के अंदर स्टील की ज़बरदस्त मांग, जो फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के पहले नौ महीनों में लगभग 7% बढ़ी है। वहीं, क्रूड स्टील प्रोडक्शन (crude metal manufacturing) में भी करीब 9.5% का इजाफा हुआ है। इस उछाल के चलते भारत फिर से स्टील का नेट एक्सपोर्टर (web exporter) बन गया है, जिसके एक्सपोर्ट्स में 33% की बढ़ोतरी हुई है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि भू-राजनीतिक जोखिम (geopolitical threat) अब कम है, क्योंकि कुल प्रोडक्शन का सिर्फ 6% ही एक्सपोर्ट होता है। हालांकि, एक चिंता की बात यह है कि Q4FY26 में थर्मल कोल (thermal coal) की कीमतों में तिमाही-दर-तिमाही 12% का इजाफा हुआ है। उम्मीद है कि कंपनियां इस बढ़ी हुई लागत को स्टील की कीमतों में बढ़ोतरी करके कस्टमर्स पर डालेंगी।
सेफगार्ड ड्यूटी का असर और ब्रोकरेज की राय
दिसंबर 2025 के मध्य में स्टील इंपोर्ट (metal import) पर लगाई गई 12% की सेफगार्ड ड्यूटी (safeguard responsibility) ने घरेलू स्टील कीमतों को ₹5,000 प्रति टन से भी ज्यादा बढ़ा दिया है। इस पॉलिसी और लगातार बनी हुई डिमांड के मेल से लोकल प्रोड्यूसर्स (native producers) की प्रॉफिटेबिलिटी (profitability) में सुधार होने की उम्मीद है। ब्रोकरेज फर्म्स भी इस सेक्टर पर बुलिश (bullish) हैं। ICICI Securities ने SAIL को ‘BUY’ रेटिंग दी है, जो ₹60,000 करोड़ मार्केट कैप वाली इस कंपनी को उसके पीयर्स (friends) के मुकाबले सबसे अट्रैक्टिव वैल्यूएशन (6x EV/EBITDA on FY28E) पर देख रही है। Axis Securities ने Tata Steel पर ₹219 के टारगेट के साथ ‘Buy’ रेटिंग बरकरार रखी है, जो बढ़ते वॉल्यूम और डोमेस्टिक प्राइस रिकवरी से EBITDA ग्रोथ की उम्मीद कर रही है। Motilal Oswal भी JSW Steel को लेकर पॉजिटिव है और ₹1,400 का टारगेट दे रहा है, क्योंकि उन्हें डबल-डिजिट रेवेन्यू ग्रोथ और EBITDA पर टन की रिकवरी की उम्मीद है।
इनपुट लागत का दबाव और ग्लोबल आउटलुक
हालांकि, बढ़ती थर्मल कोल की कीमतें मार्जिन पर दबाव डाल सकती हैं। उम्मीद है कि प्रोड्यूसर्स इन बढ़ी हुई इनपुट कॉस्ट (enter price) को कस्टमर्स से वसूल कर अपने मार्जिन को बचाए रखेंगे। इसके लिए कंपनियों के पास अच्छी प्राइसिंग पावर (pricing energy) होनी जरूरी है। साथ ही, कंपनियां अपने ऑपरेटिंग कॉस्ट (working price) और एम्प्लॉई कॉस्ट (worker price) को कम करने पर भी ध्यान दे रही हैं। ग्लोबल (international) लेवल पर, स्टील की कीमतें 2025 के मध्य से अंत तक गिर सकती हैं, जिसके बाद 2026 में रिकवरी की उम्मीद है। यह EU ETS और चीन में स्थिर होती डिमांड जैसे फैक्टर्स से प्रभावित होगा।
प्रमुख स्टील कंपनियों का वैल्यूएशन
वैल्यूएशन (valuation) की बात करें तो, SAIL का P/E फिलहाल 22.21 से 32.8 के बीच है, जिसका मार्केट कैप करीब ₹60,000 करोड़ और ROE 4.5-4.8% है। Tata Steel का P/E FY25 के लिए 57.65x है, जो कि JSW Steel से ज्यादा है। JSW Steel का मार्केट कैप लगभग ₹2.8-3.0 लाख करोड़ है और इसका P/E 33.7 से 40.5x के दायरे में है। वहीं, Jindal Stainless (19.59x) और Sarda Energy (17.54x) जैसे पीयर्स (friends) कम मल्टीपल्स (multiples) पर ट्रेड कर रहे हैं।
जोखिम: एंटीट्रस्ट जांच और इनपुट सप्लाई
लेकिन, सेक्टर के सामने कई बड़े जोखिम (dangers) भी हैं। भारत के कंपटीशन कमीशन ऑफ इंडिया (CCI) ने पाया है कि Tata Steel, JSW Steel, SAIL और 25 से ज्यादा अन्य कंपनियों ने 2015 से 2023 तक स्टील की कीमतों पर मिलीभगत (collusion) की थी। इसमें Tata Steel और JSW Steel के CEOs सहित 56 एग्जीक्यूटिव्स (executives) और चार पूर्व SAIL चेयरमैन संभावित जुर्माने और इमेज (picture) को नुकसान के दायरे में आ सकते हैं। दूसरी ओर, इंडस्ट्री ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से इंपोर्टेड कोकिंग कोल (coking coal) पर बहुत ज्यादा निर्भर है, जिस पर फाइनेंशियल, रेगुलेटरी और क्लाइमेट से जुड़े जोखिम हैं, जो सप्लाई में दिक्कतें और कीमतों में उछाल ला सकते हैं। ऐतिहासिक रूप से, SAIL प्रबंधन से जुड़ी अनियमितताओं (integrity points) से जूझती रही है, वहीं Tata Steel ‘Tata Tapes’ और जमीन विवादों में फंसी है। JSW Steel ने पिछले फाइनेंशियल ईयर (FY25) में रेवेन्यू और नेट प्रॉफिट में गिरावट देखी है, और मार्च 2025 तक इसका डेट-टू-इक्विटी रेशियो (debt-to-equity ratio) 1.21 था।
भविष्य की राह: डोमेस्टिक स्ट्रेंथ्स बनाम ग्लोबल अनिश्चितता
आगे चलकर, 2025 में ग्लोबल स्टील डिमांड (international metal demand) के स्थिर होने और 2026 में भारत और यूरोप जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के चलते मामूली सुधार की उम्मीद है। चीन की डिमांड में गिरावट धीमी हो सकती है, लेकिन ओवरकैपेसिटी (overcapacity) और ट्रेड टेंशन (commerce tensions) अभी भी जोखिम बने हुए हैं। भारत में, सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर (infrastructure) खर्च और नीतियां 2025-2026 तक 9% की डिमांड ग्रोथ को सहारा दे सकती हैं। कंपनियों को इन डोमेस्टिक स्ट्रेंथ्स (home strengths) को बढ़ती इनपुट कॉस्ट, ग्लोबल ट्रेड के मुद्दे और एंटीट्रस्ट जांच (antitrust probes) के नतीजों के बीच संतुलन बनाना होगा। डोमेस्टिक डिमांड और पॉलिसी सपोर्ट से मिलने वाली प्राइसिंग पावर इन चुनौतियों से निपटने की कुंजी होगी।
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