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व्हाइट हाउस के ईस्ट विंग को गिराने से लेकर विदेशी नेताओं को पकड़ने तक- इस राष्ट्रपति को ‘न’ सुनने की आदत नहीं रही है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले ने उनकी मौजूदा व्यापार रणनीति को पटरी से उतार दिया है.
इस फ़ैसले में कहा गया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल कर रेसिप्रोकल (परस्पर) और देश विशेष टैरिफ़ नहीं लगा सकते.
पिछले साल अप्रैल में लिबरेशन डे पर रोज़ गार्डन में दिखाई गई टैरिफ़ की सूची और हाल ही में ट्रंप की ग्रीनलैंड पर कब्ज़े की उनकी योजना का समर्थन न करने वाले यूरोपीय देशों को टैरिफ़ की धमकी, इन दोनों ने विश्व व्यापार व्यवस्था को उलट-पलट कर रख दिया. इससे विकास को भारी धक्का लगने का ख़तरा पैदा हो गया.
लेकिन अगर आप यह सोच रहे हैं कि हम ट्रंप से पहले के दौर में लौट रहे हैं, जब सब कुछ सामान्य था- तो ठहरिए और फिर से सोचिए.
पहली बात तो यह कि यह फ़ैसला केवल उन अतिरिक्त टैरिफ़ को अमान्य करता है जो ट्रंप ने पिछले साल पद संभालने के बाद लगाए थे. लिबरेशन डे के बाद हुई कड़ी सौदेबाज़ी के बाद अमेरिका में सामान बेचने वाले देशों के लिए औसत टैरिफ़ दर लगभग 15% पर आकर टिकी थी.
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले ने सैद्धांतिक रूप से इस दर को आधे से भी कम कर दिया है. लेकिन यह अब भी 6% से ऊपर है, जो 2025 की शुरुआत में सामान्य दर से लगभग तीन गुना है- क्योंकि अलग अलग तरीकों से लगाए गए टैरिफ़ अभी भी लागू हैं.
दूसरी बात, आयातकों को मौजूदा टैरिफ़ स्तरों के मुकाबले बहुत ज़्यादा बदलाव नहीं दिखेगा. ध्यान रखें कि 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (आईईईपीए) के तहत लगाए गए टैरिफ़ों का क्या हुआ था. पिछले साल जो पैसा वसूला गया था उसे देखें तो वह औसतन लगभग 11% टैरिफ़ के बराबर बैठता है.
टैरिफ़ का असर हल्का रहा

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आयातक तेज़ी से अपनी सप्लाई चेन उन देशों से हटा रहे हैं जिन पर सबसे ऊँचे टैरिफ़ लगे हैं. चीन से कपड़े और खिलौनों जैसी वस्तुओं की बिक्री पर इसका असर पड़ा है. या फिर आयातकों ने कुछ अतिरिक्त लागत खुद झेली है या सप्लाई चेन में बाँट दी है- जिससे अमेरिका में महँगाई पर असर सीमित रहा है.
यह और साथ ही राजस्व बनाए रखने की इच्छा (पिछले साल टैरिफ़ से आय 240 अरब डॉलर तक पहुँच गई थी, हालाँकि अब यह स्थिर होती दिख रही है) शायद ट्रंप को पलटवार करने की ताक़त देती है.
फ़ैसले से पहले राष्ट्रपति ने कहा था, “हम कुछ न कुछ रास्ता निकाल लेंगे”.
कई कानूनी तरीके हैं जिन्हें ट्रंप आईईईपीए टैरिफ़ों के मामले को दोहराने के लिए आज़मा सकते हैं. लेकिन ये कहीं ज़्यादा जटिल और लंबे कानूनी रास्ते हैं.
इससे आयातकों के लिए एक संभावना खुलती है कि वह जल्दी-जल्दी माल मंगा लें, लेकिन साथ ही जोखिम भी है. क्योंकि यह तय नहीं है कि ट्रंप अलग-अलग देशों और उत्पादों पर लगाए गए टैरिफ़ों को किस हद तक बदल सकते हैं.
हाल के दिनों में राष्ट्रपति के सुर कुछ नरम भी हुए हैं, खासकर जीवनयापन की लागत पर असर को देखते हुए.
उदाहरण के लिए, फर्नीचर पर ऊँचे टैरिफ़ लगाने की योजनाएँ पहले ही टाल दी गई हैं, जबकि कुछ आयातित खाद्य पदार्थों पर लगाए गए शुल्कों पर फिर से विचार किया गया है. अमेरिकी परिवारों के ख़रीदारी के बिलों पर और रियायतें दी जा सकती हैं- ख़ासकर तब, जब राजस्व के और घटने के कारण ‘टैरिफ़ डिविडेंड चेक’ देने की संभावना कम हो जाए.
लेकिन यह संभावना अमेरिकी आयातकों के लिए नई अनिश्चितताओं से भरी होगी, ख़ासकर छोटे आयातकों के लिए, जिनकी सप्लाई चेन और ख़रीद की क्षमता बहुत अच्छी नहीं है और दुनिया भर में निर्यात से जुड़े व्यवसायों के लिए भी.
व्यापार सहयोगियों को करीब धकेलना

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तो अमेरिका के व्यापारिक साझेदारों का क्या?
पिछले साल जब अमेरिकी आयातक सप्लायर बदलने के लिए दौड़े, तो चीन पर ऊँचे टैरिफ़ लगे होने की वजह से थाईलैंड और वियतनाम जैसे एशियाई उत्पादकों को फ़ायदा हुआ. लेकिन चीन तो फिर भी फलता-फूलता रहा क्योंकि एआई बूम के बीच अमेरिका में आईटी हार्डवेयर आयात में उछाल आया था.
चीन ने अफ्रीका के उभरते बाज़ारों पर ध्यान और केंद्रित किया और कनाडा जैसे देशों ने भी उसे लुभाया. ट्रंप की पैदा की व्यापारिक हलचल कई देशों के लिए एक फायदेमंद साबित हुई, जिसने उन्हें नए व्यापारिक रिश्ते बनाने और मज़बूत करने की ओर धकेला.
असल में, पिछले साल वैश्विक व्यापार ने शायद विश्व आर्थिक वृद्धि को पीछे छोड़ दिया. लेकिन यह सवाल तो उठता ही है कि नई अनिश्चितताओं के बीच, क्या इस साल उसे दोहराया जा सकेगा.
अमेरिका बार-बार यह दर्शा रहा है कि वह एक अस्थिर साझेदार है, व्यापार की शर्तें कैसी भी हों, यह यूरोपीय संघ और ब्रिटेन जैसे अमेरिका के पहले के करीबी सहयोगियों को और दूर ठेल सकता है और एक-दूसरे के नज़दीक करवा सकता है.
और अनिश्चितताएं अभी और हैं- जैसे कि जापान जैसे देशों के साथ हुए उन समझौतों का क्या होगा, जिनमें अमेरिका में ज़्यादा निवेश करने के बदले उसे सबसे ख़राब आईईईपीए टैरिफ़ों से राहत मिली थी.
बेशक वित्तीय बाज़ारों को भी अनिश्चितता के इस नए दौर से जूझना होगा.
तो भले ही राष्ट्रपति ट्रंप का एक ताक़तवर औज़ार छिन गया हो, लेकिन उनके उठाए कदमों के असर तो बने ही हुए हैं.
पिछला साल एक ऐसे राष्ट्रपति के नाम रहा जो अनिश्चितता को हथियार बनाकर बातचीत में बढ़त लेने का आदी है. लेकिन उतना ही सच यह भी है कि दुनिया अब इस लहर पर सवार होना सीख चुकी है और उसका फ़ायदा उठाना भी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.