जो देश युद्ध लड़ रहा है, उसे तो भारी आर्थिक नुकसान होना तय है. लेकिन कुछ-एक ऐसे से देश भी हैं, जो ईरान-इजरायल युद्ध को लेकर छपपटा रहा है. क्योंकि जितने दिन तक ये युद्ध चलेगा, उस देश का नुकसान बढ़ता जाएगा. इसके पीछे एक रणनीति भी काम कर रही है, जिसके पीछे डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) का दिमाग है, और निशाने पर चीन है.
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ईरान पर दबाव के साथ-साथ चीन को अपनी ताकत दिखा रहे हैं, इस खेल के केंद्र में कच्चा तेल है. इससे पहले अमेरिका वेनेजुएला के तेल खजाने पर अपना कब्जा कर चुका है.
दरअसल, ईरान के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल रिजर्व है, जो 209 अरब बैरल के आसपास है. यही नहीं, दुनिया के कुल तेल भंडार का लगभग ये करीब 12 से 13 फीसदी बैठता है. फिलहाल तमाम अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद ईरान रोजाना करीब 3.3 से 3.5 मिलियन बैरल कच्चे तेल का उत्पादन करता है, और इसमें से करीब रोजाना 1.5 मिलियन बैरल निर्यात किया जाता है.
तमाम अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद चीन ईरानी क्रूड ऑयल का सबसे बड़ा खरीदार रहा है. रिपोर्ट्स की मानें, तो चीन द्वारा ईरान के कुल क्रूड ऑयल निर्यात का करीब 80 फीसदी के आसपास आयात किया जाता है, जो लगभग 10 लाख बैरल प्रतिदिन से ज्यादा है. चीन ईरानी तेल को प्रतिबंधों के बीच अलग-अलग चैनलों के जरिए खरीदता है, जिनमें छोटे रिफाइनर, थर्ड-पार्टी ट्रेडर्स शामिल हैं.
अमेरिका की ये रणनीति
ऐसे में अगर ईरान में अमेरिका का वर्चस्व कायम होता है तो फिर चीन के लिए संकट खड़ा हो सकता है. युद्ध के चलते स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज बंद होने से उसकी टेंशन और भी बढ़ गई है, क्योंकि दुनिया के तेल आपूर्ति का लगभग 5वां हिस्सा इसी रूट से होकर गुजरता है.
ईरान से पहले अमेरिका ने वेनेजुएला पर अटैक किया था और ये भी सीधे चीन को चोट पहुंचाने वाला कदम था. दरअसल, अमेरिकी ऊर्जा एजेंसी US Energy Information Administration के मुताबिक, वेनेजुएला के पास करीब 303 अरब बैरल कच्चे तेल का प्रमाणित भंडार है. जो पृथ्वी पर किसी भी देश के मुकाबले वेनेजुएला को सबसे ज्यादा तेल भंडार वाला देश बनाता है.
Venezuela Oil पर कंट्रोल करने के साथ ही ट्रंप ने साफ दिया कि इसे US द्वारा मार्केट प्राइस के हिसाब से दूसरे खरीदारों को बेचा जाएगा. यानी जो देश डिस्काउंट पर ये तेल खरीद रहे थे, उनके सामने बड़ा संकट और इसकी जद में भी सबसे ज्यादा चीन आया. क्योंक रिपोर्ट बताती है कि 2020-2023 के बीच वेनेजुएला से चीन ने कच्चा तेल मार्केट प्राइस की तुलना में औसतन 20–25% डिस्काउंट पर खरीदा था.
बता दें, चीन अपनी जरूरत का करीब 70% के आसपास तेल आयात करता है. इसमें से करीब 15% तो सिर्फ ईरान-वेनेजुएला से आता है. ईरानी और वेनेजुएला का तेल रुकने पर चीन को दूसरे विकल्पों पर निर्भरता बढ़ानी होगी और सऊदी अरब, इराक, रूस, ब्राजील से अतिरिक्त तेल खरीदारी करनी होगी.
1. तेल सप्लाई पर सीधा असर
चीन दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक है. वह बड़ी मात्रा में तेल पश्चिम एशिया से खरीदता है, खासकर ईरान और खाड़ी देशों से. अगर युद्ध बढ़ता है और Strait of Hormuz बंद होता है, तो वैश्विक तेल सप्लाई बाधित हो सकती है. इससे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ेंगी, जिसका सीधा असर चीन की अर्थव्यवस्था और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर पड़ेगा.
2. बेल्ट एंड रोड परियोजनाओं पर खतरा
चीन की महत्वाकांक्षी Belt and Road Initiative (BRI) के कई प्रोजेक्ट पश्चिम एशिया में हैं. युद्ध की स्थिति में इन परियोजनाओं की सुरक्षा और निवेश पर जोखिम बढ़ जाएगा.
3. चीन-ईरान रणनीतिक साझेदारी
चीन और ईरान के बीच 25 साल का रणनीतिक समझौता है. अगर अमेरिका और ईरान सीधे युद्ध में उलझते हैं, तो चीन पर कूटनीतिक दबाव बढ़ेगा, उसे संतुलन बनाना पड़ेगा, क्योंकि वह इजरालय (Israel) और अमेरिका के साथ भी आर्थिक संबंध रखता है.
4. वैश्विक व्यापार और निर्यात पर असर
चीन की अर्थव्यवस्था निर्यात आधारित है. युद्ध के कारण अगर वैश्विक मंदी या सप्लाई चेन बाधित होती है, तो चीन के निर्यात को झटका लगेगा.
5. अमेरिका की रणनीतिक प्राथमिकताएं
अगर अमेरिका पश्चिम एशिया में उलझता है, तो एक ओर चीन को इंडो-पैसिफिक में कुछ रणनीतिक राहत मिल सकती है. लेकिन दूसरी ओर, अस्थिरता से वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बढ़ेगी, जो चीन के लिए नुकसानदेह है.
Iran और China के बीच व्यापार का आकार
साल 2023 में दोनों देशों के बीच कुल व्यापार करीब $14.6 बिलियन का रहा था. इसमें चीन से ईरान को सामान का निर्यात लगभग $10.7 बिलियन था, ईरान से चीन को आयात लगभग $4.6 बिलियन रहा था.
हालांकि चीन के कुल वैश्विक व्यापार के लिहाज से ईरान का हिस्सा छोटा है, यानी चीन के लिए ईरान व्यापार में बड़ा हिस्सा नहीं रखता. लेकिन ईरान के लिए चीन उसका सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है. खासकर ऊर्जा, मशीनरी और अन्य वस्तुओं के लिए के ईरान पूरी तरह से चीन पर निर्भर है.
अब युद्ध की स्थिति में ईरान को नुकसान होने पर उसका असर चीन पर दिखने वाला है. हर हाल में चीन ईरान में शांति चाहता है, जबकि अमेरिका तेल पर अंकुश लगाकर चीन को कमजोर करना चाहता है. अगर युद्ध लंबे समय तक चलता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में और उछाल संभव है, और इसका सबसे ज्यादा असर चीन पर होने वाला है. चीन का बजट बिगड़ सकता है, और अमेरिका यही चाहता है.
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